PT-1 ( Production Technology – 1) Question paper in hindi 2021-2022

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Question Answer

प्रश्न 1- हस्त फोर्जन के लिए अभीष्ट स्कन्ध का आकलन कैसे करेंगे?

उत्तर- हस्त फोर्जन हेतु अभीष्ट स्कन्ध की आकलन की क्रियाविधि निम्नांकित है

1. शुद्ध वजन का निश्चत

(i) फोर्जिंग्स का वजन इसकी आरेखन की सहायता से ज्ञात किया जाता है। इस कार्य के लिए पूरी आरेखन का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाता है फिर आरेखन को कुछ निश्चित विमा वाले भागों में विभक्त कर लिया जाता है।

(ii) फिर उपरोक्त विभक्त भागों का आयतन ज्ञात कर लिया जाता है। आयतन में से छिद्रों या कोटरों के आयतनों को घटा दिया जाता है यदि आरेखन में छिद्र या कोटर हो।

(iii) फिर आयतन में धातु के घनत्व का गुणा करके फोर्जिग का अभीष्ट शुद्ध वजन ज्ञात कर लिया जाता है।

2. कुल वजन का निश्चय- फोर्जिग का कुल वजन का अभिप्राय स्कन्ध की उस मात्रा से है जिससे कि .अभीष्ट फोर्जन का निर्माण किया जाना है। फोर्जिंग को कुल वजन में सम्भावित हासों (कर्तन ह्रास, चमक ह्रास, पपड़ी ह्रास, स्यू ह्रास व संडासी ह्रास) को भी सम्मिलित किया जाता है। इस वजन के आधार पर ही स्कन्ध को उपयुक्त लम्बाई तथा उपयुक्त काट में व्यक्त किया जाता है।

3. स्कन्ध का मूल्य – धातु के मूल्य को इसके भार के रूप में व्यक्त किया जाता है किन्तु आकलनकर्ता इसे सदैव लम्बाई द्वारा व्यक्त करता है इसलिए आवश्यकतानुसार उपरोक्त दोनों ही तरीकों से अर्थात् लम्बाई तथा वजन से प्रत्यक्ष पदार्थ के मूल्य को ज्ञात कर लिया जाता है।

4. प्रत्यक्ष श्रम लागत ज्ञात करना – फोर्जन प्रक्रिया में कार्यरत श्रमिक की मजदूरी के आधार पर प्रत्यक्ष श्रम लागत की गणना की गणना की जाती है।

प्रश्न 2- लम्बाई वर्धन तथा फुलरिंग को समझाइए।

 उत्तर- लम्बाई वर्धन तथा फुलरिंग- लम्बाई वर्धन या दैर्ध्यवर्धन हस्त फोर्जन की एक क्रिया है जिससे धातु कार्यखण्ड के अनुप्रस्थ काट को कम करके उसकी लम्बाई में वृद्धि की जाती है। इस क्रिया में सीधा या क्रॉस पीन हथौड़ा या फुलरों व स्लेज धन का प्रयोग किया जाता है। लम्बाई वर्धन हेतु सर्वप्रथम कार्यखण्ड के केवल उतने ही भाग को गर्म किया जाता है जितने भाग की लम्बाई में वृद्धि की जानी हो। कार्यखण्ड के अनावश्यक गर्म हुए भाग को पानी में डुबोकर ठण्डा कर लिया जाता है। फिर कार्यखण्ड के गर्म भाग को सामान्यतया निहाई को कोट (edge) या सींग पर रखकर क्रॉस हथौड़े से पीटा जाता है।

 क्रिया के दौरान आवश्यकतानुसार हथौड़े का पीन अथवा उसका कार्यकारी फलक का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार कार्यखण्ड की मोटाई कम हो जाती है तथा उसकी लम्बाई व चौड़ाई में वृद्धि हो जाती है। यदि कार्यखण्ड की चौड़ाई तथा मोटाई दोनों ही कम की जानी हो तो कार्यखण्ड को प्रत्येक प्रहार के बाद 90 पर घुमाकर पीटते व आगे बढ़ाते रहते हैं। यदि कार्यखण्ड की लम्बाई में शीघ्रता से वृद्धि की जानी हो और सहायक भी पास ही में उपलब्ध हो तो कार्यखण्ड को दो फुलरों के मध्य में रखकर स्लेज धन की सहायता से चोट लगानी चाहिए। उपरोक्त लम्बाई वर्धन की क्रिया पूर्ण होने के बाद कार्यखण्ड की सतह को समतलक द्वारा समतल किया जाना चाहिए।

यदि गोल छड़ की लम्बाई में वृद्धि की जानी हो तो सर्वप्रथम छड़ को हथौड़े या घन से पीटकर इसकी वर्गाकार आकृति बना ली जाती है। इस प्रकार छड़ की कुछ लम्बाई तो इसकी संक्रिया में बढ़ जाती है। फिर इस वर्गाकार छड़ के किनारों को पीटकर इसकी अष्ट कोणीय आकृति बना ली जाती है। ऐसा करने से छड़ की लम्बाई में काफी वृद्धि हो जाती है। इसके बाद इस छड़ को घुमा-घुमाकर पीटते व आगे बढ़ाते रहते हैं जिससे कि इसका अनुप्रस्थ काट लगभग गोल आकृति का हो जाता है। अन्त में इस छड़ को दो स्वेजों के मध्य में रखकर इसे पीटते व घुमाते हुए आगे बढ़ाते जाते हैं। इस प्रकार छड़ लगभग गोल व अभीष्ट व्यास की बन जाती है। इसी प्रकार पुलरिंग भी एक ऐसी फोर्जन संक्रिया है जिसके अन्तर्गत लम्बाई की अपेक्षा कार्यखण्ड की चौड़ाई अधिक बढ़ाई जाती है। अन्तर केवल इतना है कि पुलरिंग को कार्यखण्ड के मध्य से प्रारम्भ किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 3– विस्फोटन प्ररूपण को विस्तार से समझाइए इसके गुण-दोष भी बताइए।(U.P.B.T.E. 1995,2004, 11, 2014)

 उत्तर- विस्फोटन प्ररूपण क्रिया तरल में विस्फोटन चार्ज के प्रस्फोटन के परिणामस्वरूप उत्पन्न झटकों से सम्पन्न होती है। विस्फोटन चार्ज को डाई पर स्थित ब्लैंक या कार्यखण्ड से कुछ दूरी पर रखकर प्रस्फोटित किया जाता है जिससे तरल (जल) में उत्पन्न उच्च दाब तरंगों के झटकों द्वारा ब्लैंक डाई की कोटर की आकृति ग्रहण कर लेता है। इन दाब तरंग जनित झटकों से लगभग 3000 किग्रा०/सेमी2 का दाब और 300 मीटर/सेकण्ड की गति उपलब्ध हो जाती है जो तुरन्त कुछ ही पलों में ब्लैंक को डाई कोटर के आकार का बना देती है। विस्फोटन प्ररूपण के द्वारा एयरक्राफ्ट तथा मिसाइल पार्ट्स का प्ररूपण किया जाता है। इस प्रक्रम द्वारा प्ररूपित कुछ प्रमुख एयरक्राफ्ट तथा मिसाइल चित्र में दर्शाये गये हैं।

विस्फोटक प्ररूपण के बारे में सारांशतः कहा जा सकता है कि इस विधि में विस्फोटक ऊर्जा को प्ररूपण बल के रूप में प्रयोग किया जाता है अर्थात् विस्फोटक की उच्च ऊर्जा आघात लहर प्ररूपण बल में परिवर्तित की जाती है। कुछ अनुप्रयोगों में तो विस्फोटक प्ररूपण द्वारा कई हजार मेगा पास्कल तक ऊर्जा प्राप्त व प्रयोग की जा चुकी है।

इस विधि से लगभग 7 मीटर व्यास तक के कार्यखण्ड प्ररूपित किए जा सकते हैं। इस विधि में T.N.T (TriNitrotoluene) PETN तथा 60% डायनामाइट इत्यादि विस्फोटक प्रयोग किये जाते हैं वैसे मूलतः दो प्रकार के विस्फोटक प्रयोग में लाये जाते हैं।

(i) उच्च विस्फोटक या प्रस्फोटनीय विस्फोटक जैसेडायनामाइट, एमाटॉल, T.N.T. व P.E.T.N.

(ii) निम्न विस्फोटक जैसे-धुआंरहित पाउडर व काला पाउडर। उच्च विस्फोटकों द्वारा प्राप्त दाब का परास 0.35 x 106 किग्रा/सेमी2 तथा निम्न विस्फोटकों द्वारा प्राप्त दाब सामान्यतः लगभग 3500 किग्रा/सेमी2 होता है।

विस्फोटन प्ररूपण के गुण

(i) यह प्रक्रम विशेष रूप से असाधारण एवं जटिल आकृतियों के लिए सर्वधा उपयुक्त रहता है, क्योंकि इस क्रम के अन्तर्गत उत्पाद के सभी भागों पर दाब का प्रभाव समान रूप से पड़ता है।

(ii) इसमें महँगी मशीनरी प्रयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

(iii) इस प्रक्रम द्वारा सभी साइज तथा सहिष्णुता वाले उत्पाद तैयार किए जा सकते है।

(iv) इस प्रक्रम द्वारा धातु का वांछित पदार्थ आकार माइक्रो सेकण्ड में तैयार हो जाता है।

(v) उच्च उत्पादन दर उपलब्ध हो जाता है।

विस्फोटन प्ररूपण के दोष

(i) इस प्रक्रम के लिए उच्च दक्षता की आवश्यकता होती है।

(ii) इस प्रक्रम के अन्तर्गत बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। 

(iii) इस प्रक्रम में समय का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि पूरी क्रिया माइक्रो सेकण्ड में पूर्ण हो जाती है।

(iv) सामान्य कार्यों के लिए यह प्रक्रम उपयुक्त नहीं है।

 प्रश्न 4- डाइयों के अपूर्ण भराव तथा अतप्त सन्धियों के दोष बताइये।

उत्तर- फोर्जन हेतु प्रयोग की जाने वाली बन्द छाप डाई की गुहिका में जब धातु का भराव पूर्णरूपेण न हो तो फोर्जिग्स दोषपूर्ण तैयार होती है। इस दोष के सम्भावित कारण निम्नांकित हैं

(a) धातु की मात्रा का कम या अपर्याप्त होना।

 (b) डाइयों व फोर्जिग्स का त्रुटिपूर्ण डिजाइन। 

(c) धातु को वांछित तापमान तक गर्म न करना। 

(d) डाइयों के बीच में धातु को उचित व उपयुक्त स्थान पर न रखना।

अतप्त सन्धियाँ – ऐसी दरारें, जो फोर्जिग्स के किनारों तथा सतह के लम्बरूप दृष्टिगोचर होती हैं, वे अतप्त सन्धियाँ कहलाती हैं। फोर्जिग्स में इस दोष के सम्भावित कारण निम्नांकित हैं

(i) डाइयों का त्रुटिपूर्ण डिजाइन।

(ii) फोर्जिग्स का त्रुटिपूर्ण डिजाइन।

(iii) डाइयों के बीच धातु को उचित व उपयुक्त स्थान पर न रखना।

प्रश्न 5– पंचकरण संक्रिया को समझाइये। 

उत्तर- पंचकरण या छिद्रण एक ऐसी संक्रिया है जिसमें धातुखण्ड को फोर्जन तापमान तक गर्म करने के बाद धातुखण्ड में पंच का बलपूर्वक प्रवेश करके छिद्र बनाया जाता है। इस संक्रिया में सर्वप्रथम धातु खण्ड पर छिद्र किये जाने वाले संस्थान पर केन्द्र पंच की सहायता से दोनों ओर एक सीध में निशान लगाकर धातुखण्ड को निहाई के प्रिचिल छिद्र व हार्डी छिद्र अथवा स्वेज ब्लॉक के निशान पर रखकर पंच पर हथौड़े या धन से प्रहार किया जाता है। जब पंच धातु खण्ड में उसकी आधी मोटाई तक प्रविष्ट हो जाए तो उसे निकाल लिया जाता है। तत्पश्चात् धातुखण्ड को पलट कर इस ओर भी पंच को पूर्व की भाँति ही रखकर हथौड़ा या धन से प्रहार किया जाता है और इस तरह धातुखण्ड में छिद्र आर-पार बन जाता है। पंचकरण की इस उपरोक्त क्रिया को चित्र में दर्शाया गया है।

छिद्रण हेतु पंच तथा डाई का प्रयोग तब किया जाना चाहिए जबकि एक ही बार में पूरा छिद्र बनाना आवश्यक हो। डाई के प्रयोग करने से ड्रिफ्ट की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है और एक ही बार में धातु-खण्ड में पूरा सही आकार का छिद्र बन जाता है। पंच और डाई का संयुक्त प्रयोग सामान्यतया दाबन कार्य में धातु की पतली चादरों में से ब्लैंक काटने में होता है। पंचकरण से पूर्व यदि धातुखण्ड पर थोडा-सा लकड़ी के कोयले का पूर्ण छिद्रक दिया जाए तो इसके जलने से उत्पन्न गैसे पंच को छिद्र में चिपकने नहीं देती। ऐसा करने से क्रिया के उपरान्त पंच को धातु खण्ड में से बाहर निकालने में भी सुगमता होती है।

प्रश्न 6- चालन यन्त्रावली के आधार पर शक्ति प्रैस के विभिन्न भागों का वर्णन करो। (U.P.B.T.E. 2011) 

उत्तर- शक्ति प्रैस बनावट में दस्ती प्रैस या फ्लाई प्रैस से लगभग मिलती-जुलती ही होती है। दोनों में पंच और डाई की क्रियाएँ तो एक समान ही होती हैं किन्तु इन दोनों में मुख्यत भिन्नता यह होती है कि फ्लाई प्रैस में रैम को एक उदता पेंच द्वारा संचालित किया जाता है जबकि शक्ति प्रैस में रैम का संचालन एक बैक तथा संयोजन दण्ड द्वारा किया जाता है। शक्ति प्रैस में रैम को शक्ति पारेषित करने हेतु जिस यांत्रिक का द्रवचालित यन्त्रावली का प्रयोग किया जाता है, उसी के अनुसार शक्ति प्रेस को यान्त्रिक या द्रवचालित शक्ति प्रैस में रैम को प्रत्यागामी गति देने के लिए अत्यधिक उच्च दाब के साथ द्रव को द्रवीय सिलेण्डर में पहिले पिस्टन के एक ओर से फिर उसके दूसरी ओर से पम्प द्वारा बारी-बारी से भेजा जाता है जिससे पिस्टन द्रवीय सिलेण्डर में प्रत्यागामी गति करता है। पिस्टन की यही प्रत्यागामी गति प्रैस के रैम को प्रत्यागामी गति प्रदान करने में सक्षम होती है जो कि क्रैक तथा संयोजन दण्ड यन्त्रावली द्वारा प्रचालित होती है क्रैक तथा संयोजन दण्ड को पिटमैन कहते हैं।

इस प्रैस में भी पंच को रैम की तली तथा डाई को मेज पर स्थित बोलस्टर प्लेट को दृढ़तापूर्वक कस दिया जाता है। गतिपालक पहिया क्रैक शाफ्ट के सिरे पर आरोपित किया जाता है गतिपालक पहिये को पट्टा चालन द्वारा एक विद्युत मोटर से चलाया जाता है। भीतर एक फ्रेम होता है जिसे एक पाद लीवर की सहायता से चलाया जाता है। पाद लीवर को दबाने से गतिपालक पहिया क्रैक शाफ्ट से सम्बन्ध हो जाता है। रैम के ऊर्ध्वगामी संचलन के अन्त में थोड़ा-सा पहले ही ब्रेक के स्वतः निर्बंधित हो जाने की भी इसमें व्यवस्था की जाती है। साथ ही क्रैक शाफ्ट को रोकने के लिए ब्रैक का प्रयोग किया जाता है।

(i) आधार – यह शक्ति प्रेस का एक मुख्य आलम्बी सदस्य है। नमनशील प्रैस के आधार में प्रैस को आवश्यकतानुसार किसी भी कोण को झुकाने तथा कसने की व्यवस्था होती है।

(ii) फ्रेम – यह प्रैस का मुख्य पिण्ड होता है। जिससे प्रैस का रैम तथा चालक यन्त्रावली इत्यादि लगी रहती है। प्रैस के फ्रेम को इतना सुदृढ़ होना चाहिए कि वह रैम के उदग्र प्रणोद को वहन कर सके।

(iii) रैम – रैम, प्रैस का मुख्य प्रचालक सदस्य होता है जो फ्रेम पर बने उदग्र निर्देशकों के बीच में ऊपर-नीचे प्रत्यागामी गति करता है। रैम की तली एक पंच लगा होता है।

(iv) पिटमैन – एक बॅक अथवा उत्केन्द्री चालित प्रैस में रैम और क्रैक शफ्ट या रैम और उत्केंद्रक को परस्पर सम्बन्ध करने वाले संयोजक दण्ड को पिटमैन कहते हैं। रैम के आघात की स्थिति को संयोजक दण्ड की लम्बाई की अदलबदल से सुगमता से बदला जा सकता है।

(v) बोलस्टर प्लेट– यह एक सपाट प्लेट होती है जो प्रैस के आधार पर फिट की जाती है। इसके उपयोग डाई ब्लॉक तथा प्रैस की अन्य सहायक युक्तियाँ को सहारा प्रदान करती है।

(vi) गतिपालक पहिया – गतिपालक पहिया चालक शाफ्ट के अन्त में लगाया जाता है जिसे क्लच की सहायता से चालक शाफ्ट के साथ लम्बाद्धित किया जाता है। गतिपालक पहिया सीधे ही वैद्युत मोटर से जुड़ा होता है। गतिपालक पहिया निष्क्रिय समय में ऊर्जा का संचय कर लेता है और यह सचित ऊर्जा प्रेस संक्रिया के दौरान कार्यखण्ड में पंच को प्रविष्ट करने के लिए रैम की सतत् चाल बनाये रखने के लिए उपयोग में आ जाती है।

(vii) बॅक, उत्केंद्रक या अन्य चालक यन्त्रावली – विद्युत मोटर की घूर्णन गति को क्रैक व संयोजन दण्ड उत्केंद्रक व संयोजन दण्ड या अन्य अनेक यन्त्रावलियों के द्वारा रैम की प्रत्यागामी गति में बदला जा सकता है।

(viii) क्लच – क्लच का उपयोग आवश्यकतानुसार चालक शाफ्ट को गति पालक पहिये के साथ आबद्ध या निर्बद्ध करने के लिए किया जाता है।

(ix) ब्रेक – ब्रेकों का प्रयोग चालक शाफ्ट को गतिपालक पहिये के साथ आबद्धित करने के बाद इच्छानुसार उसे रोकने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 7– एक स्वच्छ चित्र द्वारा विद्युत चुम्बकीय फार्मिंग प्रक्रम को समझाइये। (U.P.B.T.E. 2010, 2012) 

उत्तर- विद्युत चुम्बकीय प्ररूपण को चुम्बकीय प्ररूपण को चुम्बकीय स्पन्दन Magnetic Pulse Forming के नाम से भी पुकारते हैं। यह उच्च ऊर्जा स्तर प्ररूपण (HERF) की एक विकसित विधि है। इस विधि में एक coil के चारों तरफ प्रबल एवं आकस्मिक चुम्बकीय क्षेत्र में कार्यखण्ड को स्थापित किया जाता है। जैसा कि निम्न चित्र में दिखाया गया है।

 फलस्वरूप कार्यखण्ड की धातु में आवर्त धारा प्रेरित होती है और अन्य किसी भी विद्युत चालक के समान कार्यखण्ड की धातु चादर प्रबल रूप में विकर्षित होती है और बलपूर्वक डाई का आकार ग्रहण कर लेती है। अगर कोई धातु विद्युत चालक नहीं है तो उस पर तांबे का लेप करने से उसमें चालकता उत्पन्न कर ली जाती है जिससे उस पर क्रिया की जा सके।

क्रिया के अन्तर्गत धातु ब्लेक वांछित सहिष्णुता में वस्तु का आकार ग्रहण करता है क्योकि ब्लैंक पर समान रूप से सभी स्थानों पर बल क्रिया करता है।

Application – विद्युत चुम्बकीय प्ररूपण के द्वारा धातु चादर के कार्यखण्डों पर आवश्यकतानुसार प्रसारण, उभरन Swaging, Flanging तथा Squeezing इत्यादि संक्रियायें की जा सकती है।

प्रश्न 8– चित्रों की सहायता से तार व नलिका कर्षण का वर्णन कीजिए। (U.R.B.T.E. 2012) 

उत्तर- तार का खींचना या तार कर्षण (Wire Drawing)- पतली तारों की बूल ब्लॉक ड्राबेन्च पर खींचकर वांछित साइज में तैयार किया जाता है। तार का खींचना, छड़ के खींचने से इस बात में भिन्न है कि तार को रोल पर लपेटा जा सकता है जबकि छड़ को सीधा रखते हुए खींचा जाता है। छड़ की लम्बाई जो ड्राबेन्च में खींची जा सकती है उसकी एक सीमा होती हैं जो कि चेन-ड्राबेन्च की चाल पर निर्भर करती है। यह सामान्यतः 50 से 100 फीट तक हो सकती है।

कर्षण डाई खिंचने से पहले छड़ या तार खिंचने के बाद प्राप्त तार अबद्ध कॉयल कर्षण जबड़ा ( (Loose coil) ब्लॉक

तार खिंचने की विधि उपरोक्त चित्र में प्रदर्शित की गई है। क्रिया के अन्तर्गत सर्वप्रथम खींचे जाने वाली छड़ या तार के सिरों को नुकीला बनाया जाता है। फिर इसे डाई छिद्र से पिरोकर कर्षण ब्लॉक (drawing Block) के जबडे से बाँध दिया जाता है जो कि शक्ति चालित होता है और तार को डाई में से बाहर खीचते हुए अपने ऊपर लपेटता है।

टयूब का खींचना या टयूब कर्षण (Tubedrawing)- छड़ों को खींचने के समान ही टयूबों को भी ड्राबेन्च पर खींचा जाता है। ट्यूबों को खींचने की विभिन्न विधियां निम्न चित्र में प्रदर्शित की गई हैं।

विधि (a) सामान्यतया प्रयोग में लाई जाती है जिसमें ट्यूब को मेड्रिल या छड़ के सहारे डाई में खींचा जाता है।

विधि (b) में फ्लोटिंग मैंड्रिल का प्रयोग किया जाता है जिसमें मैड्रिल स्वतः ही सही स्थिति में अपने आपको समंजित (adjust) कर लेती है।

विधि (c) का उपयोग छोटे साइज की ट्यूबों को खींचने के लिये किया जाता है।

विधि (d)-जिसमें मेड्रिल या छड़ का प्रयोग नहीं किया जाता ट्यूब के भीतरी व्यास पर नियन्त्रण रखने में असमर्थ होती है।

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